
आज हम बात करेंगे मल्टीपल कार कंपनीज़ के “माइंडसेट” यानी उनकी सोच के बारे में। देखिये, चाहे वो ऑटोमोबाइल कंपनी हो या कोई और, सब यहाँ बिज़नेस करने आए हैं। सबका अल्टीमेट गोल पैसा कमाना है, और इसमें कोई बुराई भी नहीं है। मैं भी ये वीडियो इसलिए बना रहा हूँ ताकि मेरा भी घर चले। लेकिन फर्क यहाँ आता है कि वो पैसा कमाने का तरीका क्या है?
Two Types of Companies
मोटा-मोटा समझें तो दो तरह की कंपनीज़ होती हैं।
पहली वो, जो प्रोडक्ट बनाते वक़्त अपना मुनाफा भी देखती हैं लेकिन साथ में कस्टमर का फायदा भी सोचती हैं।
और दूसरी वो, जो सिर्फ और सिर्फ मुनाफा देखती हैं। ये वो कंपनीज़ हैं जो सिर्फ उतना ही करती हैं जितना सरकारी गाइडलाइंस कहती हैं। मान लीजिये अगर किसी देश में सेफ्टी का स्टैंडर्ड 255 ग्राम है, तो वो 255 ग्राम की ही गाड़ी बनाएंगी। 256 ग्राम की बिल्कुल नहीं, 254 या 253 भले ही बना दें। उनका मकसद है बस नियम मानना और प्रॉफिट कमाना।
वहीं दूसरी तरफ वो कंपनीज़ हैं जो सोचती हैं कि अगर नियम 255 ग्राम का है, तो क्यों न हम 250 किलो या 350 किलो की सेफ्टी दें? ताकि लोग भरोसे के साथ हमारी गाड़ी खरीदें। बस यही फर्क है काम करने के तरीके में, और आज मैं आपको यही दिखाने वाला हूँ।
The Secret Behind Global NCAP Stars
भारत NCAP आने से पहले, ग्लोबल NCAP ने करीब 75 से 80 भारतीय गाड़ियों का क्रैश टेस्ट किया है। जब मैं उनकी रिपोर्ट्स देख रहा था, तो मैंने एक बहुत इंटरेस्टिंग चीज़ नोटिस की। कुछ रिपोर्ट्स के आगे एक ‘स्टार’ (*) लगा हुआ था और कुछ के आगे नहीं।
जब मैंने इसकी गहराई में जाकर पता किया तो समझ आया कि जिस रिपोर्ट के आगे ‘स्टार’ है, उसका मतलब है कि कंपनी ने अपनी मर्जी से और अपने खर्चे पर वो गाड़ी टेस्ट के लिए भेजी है।
और जहाँ स्टार नहीं है, उसका मतलब है कि ग्लोबल NCAP ने खुद रैंडमली मार्किट से गाड़ी खरीदी और टेस्ट की। यानी कंपनी को पता भी नहीं था।
तो चलिए, अब देखते हैं कि कौन सी कंपनी अपनी मर्जी से गाड़ी भेजती है और कौन सी कंपनी की गाड़ियाँ ‘पकड़ी’ जाती हैं। यह डेटा बहुत रोमांचक है!
Companies Tested Randomly (Without Consent)
सबसे पहले उन कंपनीज़ की बात करते हैं जिनकी गाड़ियाँ ग्लोबल NCAP ने सबसे ज्यादा बार रैंडमली उठाई हैं।
इस लिस्ट में टॉप पर है Maruti Suzuki। ऐसा नहीं है कि ग्लोबल NCAP इनके पीछे पड़ा है, बल्कि इनकी गाड़ियाँ बिकती ही सबसे ज्यादा हैं। अब तक इनकी 15 गाड़ियों का टेस्ट हुआ है। इनमें से 4 में तो एयरबैग्स ही नहीं थे, तो उन्हें छोड़ देते हैं। बची हुई 11 गाड़ियों में से सिर्फ पुरानी वाली ‘Vitara Brezza’ (4 स्टार) और ‘Ertiga’ (3 स्टार) ने ठीक स्कोर किया। बाकी 9 गाड़ियों ने या तो 0, 1 या मैक्सिमम 2 स्टार स्कोर किए। यह हालत है देश की सबसे बड़ी कार कंपनी की।
दूसरे नंबर पर है Hyundai। इनकी 5 बार गाड़ियाँ उठाई गईं। एयरबैग्स वाली 3 गाड़ियों का रिजल्ट देखें तो कोई भी गाड़ी 3 स्टार से ऊपर नहीं जा पाई।
तीसरे नंबर पर Honda है। इनकी 5 गाड़ियाँ उठाई गईं, जिनमें से एयरबैग्स वाली 3 गाड़ियों ने मैक्सिमम 4 स्टार स्कोर किए। जो कि ठीक है।
इसके अलावा Renault, Tata (पुराने मॉडल्स), Mahindra और VW की भी एक-एक दो-दो गाड़ियाँ उठाई गईं, लेकिन सैंपल साइज़ कम होने की वजह से उन पर ज्यादा बात नहीं करेंगे। लेकिन हाँ, Nissan Magnite और Toyota Urban Cruiser को भी रैंडमली उठाया गया था और उन्होंने 4 स्टार स्कोर करके खुद को साबित किया।
Companies That Volunteered (Voluntary Testing)
अब आते हैं उस लिस्ट पर जहाँ कंपनीज़ ने खुद आगे बढ़कर कहा, “लो हमारी गाड़ी टेस्ट करो।”
यहाँ टॉप पर है Tata Motors।
इन्होंने 9 बार अपनी मर्जी से गाड़ियाँ भेजीं और रिकॉर्ड देखिये—नौ की नौ गाड़ियों ने कम से कम 4 स्टार या उससे ज्यादा स्कोर किया।
दूसरे नंबर पर Mahindra है। इन्होंने 5 बार गाड़ियाँ भेजीं और सबने कम से कम 4 स्टार स्कोर किए। आप फर्क देख रहे हैं? रैंडम उठने वाली गाड़ियाँ 0-1 ला रही हैं और मर्जी से भेजने वाली 4-5 ला रही हैं।
तीसरे नंबर पर मैं Renault की तारीफ करना चाहूँगा। इन्होंने 5 बार गाड़ियाँ भेजीं। भले ही इनकी गाड़ियाँ (जैसे Kwid) पहले फेल हुईं, 0 स्टार मिले, लेकिन इन्होंने हार नहीं मानी। गाडी में सुधार किया, फिर भेजा, फिर 1 स्टार मिला। मतलब कम से कम इन्होंने कोशिश तो की!
यही हाल Kia और VW/Skoda का है। Kia की Carens ने भले ही अच्छा परफॉर्म नहीं किया, लेकिन उन्होंने 3 बार गाड़ी भेजकर उसे सुधारने की कोशिश जरूर की।
The Big Players Missing in Action
यहाँ सबसे अफ़सोस की बात ये है कि Hyundai ने सिर्फ एक बार अपनी गाड़ी भेजी, वो भी Verna (5 स्टार)। लेकिन जो उनकी सबसे ज्यादा बिकने वाली गाड़ियाँ हैं—Creta, i20, Grand i10 Nios—इन्हें कभी अपनी मर्जी से टेस्ट के लिए नहीं भेजा।
Toyota ने भी Innova या Fortuner जैसी गाड़ियों को कभी अपनी मर्जी से नहीं भेजा। उन्हें पता है कि लोग तो वैसे भी लाइन लगाकर खरीद ही रहे हैं, तो क्यों बेकार में टेस्ट करवाकर रिस्क लिया जाए?
Why Maruti Changed its Strategy?
Maruti भारत में 40-45% मार्किट शेयर रखती है। जितना Tata, Mahindra और Hyundai मिलकर बेचते हैं, उतना Maruti अकेले बेच देती है। फिर भी, इन्होंने लम्बे समय तक अपनी मर्जी से गाड़ी नहीं भेजी। बीच में तो इन्होंने साफ़ कह दिया था कि हम क्रैश टेस्ट में विश्वास नहीं रखते।
लेकिन अब? अब इन्होंने Dzire भेजी जिसने 5 स्टार स्कोर किए। जानते हैं क्यों? क्योंकि आप बदल गए हैं। कस्टमर अब ‘सेफ्टी’ मांग रहा है। इसी डर से, अपना मार्किट शेयर बचाने के लिए उन्हें अपनी स्ट्रेटेजी बदलनी पड़ी।
A Note on New 5-Star Ratings
यहाँ एक बात और बता दूँ। आजकल जो धड़ल्ले से 5 स्टार मिल रहे हैं, वो पुराने वाले 5 स्टार से थोड़े अलग हैं। आजकल की रेटिंग्स में ‘बिल्ड क्वालिटी’ से ज्यादा ‘सेफ्टी फीचर्स’ (जैसे 6 एयरबैग्स, ESP) के नंबर होते हैं। अगर गाड़ी में फीचर्स ठूंस दिए जाएं, तो रेटिंग अपने आप बढ़ जाती है, भले ही लोहे की मजबूती वैसी ही क्यों न हो। इस पर मैंने एक डिटेल वीडियो अलग से बनाया है, जिसका लिंक आपको डिस्क्रिप्शन में मिल जाएगा।
Conclusion
दोस्तों, इन बड़ी-बड़ी कंपनीज़ को ‘बड़ा’ किसी और ने नहीं, हमने बनाया है। अपनी मेहनत की कमाई देकर। और बदले में हमें क्या मिला? 0 स्टार और 1 स्टार की सेफ्टी? अगर ये गाड़ियाँ सस्ती होतीं तो समझ भी आता, लेकिन ये भी उतने ही दाम में मिलती हैं।
आज का ये वीडियो बस एक अवेयरनेस के लिए था। खरीदना आपको वही है जो आपकी जेब गवाही देगी और जो आपको पसंद आएगी। यूट्यूब पर कोई कुछ भी ज्ञान दे, आप करोगे अपने मन की ही। लेकिन, एक जागरूक कस्टमर बनना हमारा हक़ है।
उम्मीद है आपको ये इनसाइड स्टोरी और एनालिसिस पसंद आया होगा। अगर हाँ, तो वीडियो को लाइक जरूर करें और ऐसे ही तड़कते-भड़कते कंटेंट के लिए चैनल को सब्सक्राइब कर लें। मिलते हैं अगली वीडियो में!
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